मेरी कलम से...
गुरुवार, 2 जुलाई 2015
मेरे अलफाज़: कलम है पर सोच नहीं, लिखें तो लिखें क्या ?
मेरे अलफाज़: कलम है पर सोच नहीं, लिखें तो लिखें क्या ?
: बहुत दिन से सोच रहा हूं कि कुछ लिखूं... लेकिन किस पर लिखूं... कांग्रेस पर लिखने लायक कुछ बचा नहीं है... फिर भी लिख दिया तो सांप्रदायिक होन...
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